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हम कौन हैं, क्यों हैं, और कब तक हैं
कर्म
जब ज़िंदगी में अच्छा या बुरा कुछ होता है, तो हम अकसर कहते हैं — “ये तो मेरे कर्मों का फल है।” लेकिन क्या सच में “कर्म” जैसी कोई चीज़ होती है, या ये बस एक सांत्वना है जो हम खुद को देते हैं?
कर्म का सिद्धांत कहता है कि हमारे हर विचार, हर शब्द और हर काम का असर किसी न किसी रूप में हमारे जीवन पर पड़ता है — आज नहीं तो कल। यह मान्यता केवल भारतीय दर्शन तक सीमित नहीं; दुनिया की लगभग हर सभ्यता में किसी न किसी रूप में “कर्म” का विचार पाया जाता है।
पर सवाल यह है कि क्या कर्म कोई अदृश्य शक्ति है जो हिसाब रखती है, या यह सिर्फ़ हमारे निर्णयों और व्यवहार के परिणाम हैं जो हमें वापस मिलते हैं?
इस लेख में हम जानेंगे कि कर्म का वास्तविक अर्थ क्या है, इसके दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक पहलू कौन से हैं, और क्या आधुनिक विज्ञान भी इस विचार को किसी रूप में स्वीकार करता है।
क्या कर्म सच में भाग्य को नियंत्रित करता है
‘कर्म’ शब्द हम बचपन से सुनते आए हैं — लेकिन अक्सर इसे सिर्फ एक डराने वाले नियम के रूप में समझते हैं: “अच्छा करो तो अच्छा मिलेगा, बुरा करोगे तो भोगना पड़ेगा।” पर क्या कर्म कोई बाहरी दंड प्रणाली है? या यह उस ऊर्जा और तरंगों का विज्ञान है जिसे हम हर छोटे-बड़े विचार और भावनाओं के माध्यम से ब्रह्मांड में भेजते रहते हैं?
यदि हम ठीक से देखें, तो कर्म केवल हमारे कार्य नहीं, बल्कि हमारे ‘भाव’ होते हैं। उदाहरण के लिए — दो व्यक्ति एक ही काम करें, पर एक प्रेम और करुणा से करे और दूसरा दिखावे या जलन से — परिणाम दोनों के लिए एक जैसे नहीं होंगे। क्योंकि कर्म का प्रभाव कार्य से ज्यादा ‘चेतना की गुणवत्ता’ पर आधारित होता है। यही कारण है कि कुछ लोग कम साधनों में भी संतुष्ट रहते हैं और कुछ सबकुछ पाकर भी बेचैन रहते हैं — कर्म ऊर्जा के रूप में भीतर कार्य करता रहता है।
कर्म कोई दंड देने वाला देवता नहीं — यह मात्र कंपन और प्रतिक्रिया का नियम है। यदि भीतर कड़वाहट है, तो जीवन वही लौटाएगा; अगर प्रेम है, तो परिस्थितियाँ भी धीरे-धीरे उसी में ढलती जाएँगी। इसे भाग्य का खेल कह देना आसान है, लेकिन सच्चाई यह है कि भाग्य केवल उन्हीं के लिए अटल लगता है जो अपने वर्तमान क्षण की शक्ति को समझे बिना बैठे रहते हैं।
कामना ,कर्म और आनंद का क्या संबंध है
भारतीय धार्मिक चिंतन में कामना, कर्म और आनंद को जीवन की तीन मूल धाराएँ माना गया है। कामना वह आंतरिक प्रेरणा है जो व्यक्ति को किसी लक्ष्य की ओर आकर्षित करती है। यह इच्छा जब सक्रिय होती है, तो वह कर्म में बदल जाती है — यानी वह क्रिया जो उस कामना को पूर्ण करने के लिए की जाती है।
परंतु हर कर्म आनंद नहीं देता। यदि कर्म केवल लालसा, भय या प्रतिस्पर्धा से प्रेरित हो, तो वह थकावट और असंतोष का कारण बनता है। वहीं, जब कामना शुद्ध होती है — यानी आत्मिक विकास, सेवा या प्रेम से प्रेरित — तब कर्म भी सहज और समर्पित होता है। ऐसे कर्म से ही आनंद की उत्पत्ति होती है।
भारतीय संत परंपरा में यह स्पष्ट किया गया है कि आनंद कोई बाहरी उपलब्धि नहीं, बल्कि कर्म की आंतरिक शुद्धता का फल है। जब व्यक्ति अपनी कामनाओं को समझदारी और विवेक से चुनता है, और उन्हें बिना आसक्ति के कर्म में बदलता है, तब जीवन में स्थायी आनंद आता है।
इसलिए, कामना दिशा देती है, कर्म गति देता है, और आनंद उस यात्रा की शांति है — जो भीतर से शुरू होकर भीतर ही समाप्त होती है।
करता और कर्म क्या है?
हम सब इस संसार में एक उद्देश्य लेकर आते हैं।
हम जन्म लेते हैं, साँसें भरते हैं, और फिर कुछ करते हैं।
जो करता है, वही करता कहलाता है।
और जो किया जाता है, वही कर्म कहलाता है।
मान लीजिए एक मनुष्य को 20 वर्षों का जीवन मिला।
इन बीस वर्षों में उसने जो भी कार्य किए—सोचा, बोला, किया—वे सब उसके कर्म हैं।
चाहे वह किसी की मदद करे या किसी को दुख दे,
हर छोटा-बड़ा कार्य उसकी आत्मा की किताब में दर्ज हो जाता है।
करता वह है जो कर्म करता है।
कर्म वह है जो समय के साथ उसके जीवन में घटित होता है।
यह संबंध बहुत सूक्ष्म है।
कर्म हमारे विचारों से जन्म लेता है,
और विचार हमारे भीतर के करता से।
जब हम यह समझ जाते हैं कि हम ही अपने कर्मों के निर्माता हैं,
तब जीवन एक साधना बन जाता है।
ज्ञान और कर्म का संबंध: करता की दिशा कैसे बदलती है?
जब कोई मनुष्य करता बनता है, तो वह अपने कर्मों से जीवन की कहानी लिखता है। लेकिन उसके कर्म केवल बाहरी क्रियाएँ नहीं होते—वे उसके भीतर के ज्ञान से गहरे जुड़े होते हैं।
ज्ञान करता की दृष्टि को बदलता है।
जिसे अज्ञान है, वह कर्म करते समय केवल फल की चिंता करता है।
लेकिन जिसे आत्मज्ञान है, वह कर्म को सेवा, साधना और समर्पण मानता है।
जैसे-जैसे करता का ज्ञान बढ़ता है, उसके कर्मों की गुणवत्ता बदलती है।
वह क्रोध में नहीं, करुणा में कर्म करता है।
वह लोभ में नहीं, संतोष में कर्म करता है।
उसके कर्म अब केवल शरीर की क्रिया नहीं रहते—वे आत्मा की अभिव्यक्ति बन जाते हैं।
ज्ञान करता को यह समझ देता है कि हर कर्म एक बीज है,
जो भविष्य में फल देगा।
इसलिए वह सोच-समझकर, जागरूकता से कर्म करता है।
अंततः, ज्ञान वह दीपक है जो करता के कर्मों को प्रकाश देता है।
बिना ज्ञान के कर्म अंधकार में भटकते हैं,
और ज्ञान के साथ कर्म जीवन को दिशा देते हैं।